दीपोत्सव
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सौजन्य जिला प्रशासन, नगर पालिक निगम उज्जैन
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अवंती नगरी नाथम
वंदे देव महेश्वरम
यस्याखिलं जगदिदं वशवर्ति नित्यं
योअष्टाभिरेव तनुभिर्भुवनानि भुक्तड्ने
यः कारणं सुमहतामपि कारणानां. तं शङ्करं शरणदं शरणं वृजामि।।
शिवके अनन्य उपासक यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय शिवराजवजी का संकल्प है महाशिवरात्रि दीपमहोत्सव मनाया जाय।
पुण्य महाशिवरात्रि पर महादेव को दीप ज्योति अर्पण का संकल्प लिया है जिसे स्वयंभू बाबा
महाकालेश्वर की नगरी ,पुण्य सलिला मां शिप्रा के तट का 21लाख दीपो से श्रृंगार ,घर घर, मंदिर ,बाजार और प्रतिष्ठानो
पर दीपमालिका से सजावट रंगोली के रंगो,उमंग के साथ महादेव पार्वती के परिणय दिवस पर असंख्य दीपमालिकाओं से अवंती नगरी को जगमगा कर एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक आयोजन से नवीन विश्व रिकॉर्ड कायम कर साकार करना है।
जिस अपरिमित उमंग,उत्साह वा उल्हास से नगरवासी बाबा महाकाल के परम भक्त इस परमपुनीत कार्य के सुव्यवस्थित नियोजन में संलग्न है,इस विलक्षण संकल्प की अविस्मरणीय अभूतपूर्व परिणीति अवश्यंभावी है
महाशिवरात्रि पर दीप ज्योति अर्पण का महत्व शास्त्रोक्त है।कहते है, दीपक जलाएं जाना ,देव दीवाली मनाये जाने वाला कारण शिव पुराण में उल्लेखित है
एक लेख है*
जिस के अनुसार कुबेर देव ने पूर्व जन्म में रात के समय शिवलिंग के पास रोशनी की थी इसी वजह से अगले जन्म में वे देवताओं के कोषाध्यक्ष बने।*
शिव की परम प्यारी,सभी देवियों से न्यारी
सृष्टि की महतारी देवी पार्वती ने देवाधिदेव महादेव का वरण उनकी माता की इच्छा के विरुद्ध किया और शिवजी को पाने के लिए कठोर तपस्चर्या की । इसके बाद शिव जी को पति रूप में पाया।
इस अवसर पर देवो के देव महादेव के प्रतीकों का रहस्योद्घाटन करना अत्यन्त प्रासंगिक लगता है।।
हम सभी ने भगवान शंकर का चित्र या मूर्ति देखी होगी। शिव की जटाएं हैं। उन जटाओं में एक चन्द्र चिह्न होता है। उनके मस्तक पर तीसरी आंख है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू, तो दूसरे में त्रिशूल है। वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे रहते हैं।
क्या आपने कभी सोचा कि इन सब शिव प्रतीकों के पीछे का रहस्य क्या है? शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। इसलिए विशिष्ट अवसर पर शिव प्रतीकों के रहस्योद्घाटन वांछित लग रहा हैं।।
**चन्द्रमा : शिव का एक नाम ‘सोम’ भी है। सोम का अर्थ चन्द्र होता है। उनका दिन सोमवार है। चन्द्रमा मन का कारक है। शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है। हिमालय पर्वत और समुद्र से चन्द्रमा का सीधा संबंध है।
चन्द्र कला का महत्व : मूलत: शिव के सभी त्योहार और पर्व चान्द्रमास पर ही आधारित होते हैं। शिवरात्रि, महाशिवरात्रि आदि शिव से जुड़े त्योहारों में चन्द्र कलाओं का महत्व है।
कई धर्मों का प्रतीक चिह्न : यह अर्द्धचन्द्र शैवपंथियों और चन्द्रवंशियों के पंथ का प्रतीक चिह्न है। मध्य एशिया में यह मध्य एशियाई जाति के लोगों के ध्वज पर बना होता था। चंगेज खान के झंडे पर अर्द्धचन्द्र होता था। इस्लाम का प्रतीक चिह्न है अर्द्धचन्द्र। इस अर्धचंद्र का ध्वज पर होने का अपना ही एक अलग इतिहास है।
चन्द्रदेव से संबंध : भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा सोम अर्थात चन्द्रमा के श्राप का निवारण करने के कारण यहां चन्द्रमा ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम ‘सोमनाथ’ प्रचलित हुआ।
**त्रिशूल : भगवान शिव के पास हमेशा एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। इसकी शक्ति के आगे कोई भी शक्ति ठहर नहीं सकती।
त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक भी है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन।
त्रिशूल के 3 शूल सृष्टि के क्रमशः उदय, संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व करते भी हैं। शैव मतानुसार शिव इन तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं। यह शैव सिद्धांत के पशुपति, पशु एवं पाश का प्रतिनिधित्व करता है।
माना जाता है कि यह महाकालेश्वर के 3 कालों (वर्तमान, भूत, भविष्य) का प्रतीक भी है। इसके अलावा यह स्वपिंड, ब्रह्मांड और शक्ति का परम पद से एकत्व स्थापित होने का प्रतीक है। यह वाम भाग में स्थिर इड़ा, दक्षिण भाग में स्थित पिंगला तथा मध्य देश में स्थित सुषुम्ना नाड़ियों का भी प्रतीक है।
** शिव का सेवक वासुकि : शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नाग कुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे।भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से स्पष्ट है कि नागों के ईश्वर होने के कारण शिव का नाग या सर्प से अटूट संबंध है। भारत में नागपंचमी पर नागों की पूजा की परंपरा है।
विरोधी भावों में सामंजस्य स्थापित करने वाले शिव नाग या सर्प जैसे क्रूर एवं भयानक जीव को अपने गले का हार बना लेते हैं। लिपटा हुआ नाग या सर्प जकड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है।
नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकि, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है, तो निश्चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे।
नाग वंशावलियों में ‘शेषनाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकि हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकि का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।
उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कंबल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।
*डमरू : सभी हिन्दू देवी और देवताओं के पास एक न एक वाद्य यंत्र रहता है। उसी तरह भगवान के पास डमरू था, जो नाद का प्रतीक है। भगवान शिव को संगीत का जनक भी माना जाता है। उनके पहले कोई भी नाचना, गाना और बजाना नहीं जानता था। भगवान शिव दो तरह से नृत्य करते हैं- एक तांडव जिसमें उनके पास डमरू नहीं होता और जब वे डमरू बजाते हैं तो आनंद पैदा होता है।
अब बात करते हैं नाद की। नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है जिसे ‘ॐ’ कहा जाता है। संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, उनके बीच विद्यमान केंद्रीय स्वर नाद है।
नाद से ही वाणी के चारों रूपों की उत्पत्ति मानी जाती है- 1. पर, 2. पश्यंती, ** मध्यमा और 4. वैखरी।
आहत नाद का नहीं अपितु अनाहत नाद का विषय है। बिना किसी आघात के उत्पन्न चिदानंद, अखंड, अगम एवं अलख रूप सूक्ष्म ध्वनियों का प्रस्फुटन अनाहत या अनहद नाद है। इस अनाहत नाद का दिव्य संगीत सुनने से गुप्त मानसिक शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। नाद पर ध्यान की एकाग्रता से धीरे-धीरे समाधि लगने लगती है। डमरू इसी नाद-साधना का प्रतीक है।
यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।
*” त्रिपुंड तिलक : माथे पर भगवान शिव त्रिपुंड तिलक लगाते हैं। यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक होता है। यह त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक है। यह सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक भी है। यह त्रिपुंड सफेद चंदन का या भस्म का होता है।
त्रिपुंड दो प्रकार का होता है- पहला तीन धारियों के बीच लाल रंग का एक बिंदु होता है। यह बिंदु शक्ति का प्रतीक होता है। आम इंसान को इस तरह का त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए। दूसरा होता है सिर्फ तीन धारियों वाला तिलक या त्रिपुंड। इससे मन एकाग्र होता है।
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उज्जैन। सीहोर के पंडित प्रदीप मिश्रा की कुबेरेश्वर धाम मे आयोजित कथा को स्थगित कर दिया गया है। पहले ही दिन उमड़ी भयंकर भीड़ के चलते ये निर्णय लिया गया। पंडित मिश्रा ने स्वयं यह घोषणा की। सम्भवतः प्रशासन के दबाव मे यह फैसला लिया गया क्योंकि पहलें ही दिन लगभग 4 लाख लोग सीहोर पहुँच गये और सब व्यवस्थाएं चौपट हो गयी। आपने कहा कि वे इस कथा को हरिद्वार तक लेकर जाएगे। इस खबर से भक्तो मे मयूसी देखी गयी।
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स्काईडाइविंग फेस्टिवल 3 से 6 मार्च के बीच उज्जैन में आयोजित होगा
उज्जैन 25 फरवरी । मध्यप्रदेश टूरिज्म बोर्ड की की ओर से उज्जैन में दताना हवाई पट्टी पर 3 मार्च से 6 मार्च के बीच स्काईडाइविंग फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है . मध्यप्रदेश में इसी तरह से 1 एवं 2 मार्च को भोपाल में भी स्काईडाइविंग फेस्टिवल आयोजित हो रहा है ।विश्व के सबसे अधिक रोमांचकारी खेलों में शामिल स्काईडाइविंग आयोजन अब मध्य प्रदेश में भी होगा ।

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